रविवार, 17 दिसंबर 2023

बड़ी बहन रेशमा को घोड़ी बनाकर चोदा | भाई बहन सेक्स कहानी

 बड़ी बहन रेशमा को घोड़ी बनाकर चोदा

मेरा नाम अतुल है और मैं 23 साल का एक युवक हूँ, मेरी  दीदी  का नाम रेशमा है। उसकी उम्र करीब 26 साल है। रेशमा दी मुझसे 3 साल बड़ी हैं। हम लोग एक मध्यम वर्ग परिवार से हैं और एक छोटे से फ्लैट में दिल्ली में रहते हैं।

हमारे घर में एक छोटा सा हॉल, डायनिंग रूम दो बेडरूम और एक किचन है। बाथरूम एक ही था और उसको सभी लोग इस्तेमाल करते थे। हमारे पिताजी और माँ दोनों नौकरी करते हैं।

रेशमा दी मुझको अतुल कह कर पुकारती हैं और मैं उनको रेशमा दी कह कर पुकारता हूँ।

शुरू शुरू में मुझे सेक्स के बारे कुछ नहीं मालूम था, मैं कॉलेज में पढ़ता था और हमारे बिल्डिंग में भी अच्छी मेरे उम्र की कोई लड़की नहीं थी। इसलिए मैंने अभी तक सेक्स का मजा नहीं लिया था और ना ही मैंने अब तक कोई नंगी लड़की देखी थी। हाँ मैं कभी कभी पॉर्न मैगजीन में नंगी तस्वीरें देख लिया करता था।

जब मुझे लड़कियों के तरफ और सेक्स के लिए रूचि होना शुरू हुआ। मेरे नज़रों के आसपास अगर कोई लड़की थी तो वो रेशमा रेशमा दी ही थीं।

रेशमा दी की लंबाई क़रीब क़रीब मेरे तरह ही थी, उनका रंग बहुत गोरा था और उनका चेहरा और शारीरिक बनावट हिंदी सिनेमा के जीनत अमान जैसा था। हाँ उनकी चूचियाँ जीनत अमान जैसे बड़ी बड़ी नहीं थी।
मुझे अभी तक याद है की मैंने अपना पहला मुठ मेरी रेशमा दी के लिए ही मारा था।

एक रविवार सुबह सुबह जैसे ही मेरी रेशमा दी बाथरूम से निकलीं, मैं बाथरूम में घुस गया।

मैंने बाथरूम का दरवाजा बंद किया और अपने कपड़े खोलने शुरू किए। मुझे जोरों की पेशाब लगी थी। पेशाब करने के बाद मैं अपने लंड से खेलने लगा।

एकाएक मेरी नजर बाथरूम के किनारे रेशमा दी के उतरे हुए कपड़ों पर पड़ी। वहाँ पर रेशमा दी अपनी नाइटगाऊन उतार कर छोड़ गई थीं। जैसे ही मैंने रेशमा दी का नाइटगाऊन उठाया तो देखा की नाइटगाऊन के नीचे रेशमा दी की ब्रा पड़ी थी।

जैसे ही मैंने रेशमा दी की काले रंग की ब्रा उठाई तो मेरा लंड अपने आप खड़ा होने लगा। मैंने रेशमा दी का नाइटगाऊन उठाया तो उसमें से रेशमा दी के नीले रंग का पैंटी भी नीचे गिर गई। मैंने पैंटी भी उठा ली। अब मेरे एक हाथ में रेशमा दी की पैंटी थी और दूसरे हाथ में रेशमा दी की ब्रा थी।

ओह भगवान ! रेशमा दी के अन्दर वाले कपड़े चूमने से ही कितना मजा रहा है यह वही ब्रा है जिसमें कुछ देर पहले रेशमा दी की चूचियाँ जकड़ी हुई थी और यह वही पैंटी है जो कुछ देर पहले तक रेशमा दी की चूत से लिपटी थी।

यह सोच सोच करके मैं हैरान हो रहा था और अंदर ही अंदर गरमा रहा था। मैं सोच नहीं पा रहा था कि मैं रेशमा दी की ब्रा और पैंटी को लेकर क्या करूँ।

मैंने रेशमा दी की ब्रा और पेंटी को लेकर हर तरफ़ से छूआ, सूंघा, चाटा और पता नहीं क्या क्या किया। मैंने उन कपड़ों को अपने लंड पर मला, ब्रा को अपने छाती पर रखा। मैं अपने खड़े लंड के ऊपर रेशमा दी की पैंटी को पहना और वो लंड के ऊपर तना हुआ था।

फिर बाद में मैं रेशमा दी की नाइटगाऊन को बाथरूम के दीवार के पास एक हैंगर पर टांग दिया। फिर कपड़े टांगने वाला पिन लेकर ब्रा को नाइटगाऊन के ऊपरी भाग में फँसा दिया और पेंटी को नाइटगाऊन के कमर के पास फँसा दिया।

अब ऐसा लग रहा था कि रेशमा दी बाथरूम में दीवार के सहारे ख़ड़ी हैं और मुझे अपनी ब्रा और पेंटी दिखा रही हैं। मैं झट से जाकर रेशमा दी के नाइटगाऊन से चिपक गया और उनकी ब्रा को चूसने लगा और मन ही मन सोचने लगा की मैं रेशमा दी की चूची चूस रहा हूँ।

मैं अपने लंड को रेशमा दी की पेंटी पर रगड़ने लगा और सोचने लगा की मैं रेशमा दी को चोद रहा हूँ।

मैं इतना गरम हो गया था कि मेरा लंड फूल कर पूरा का पूरा टनटना गया था और थोड़ी देर के बाद मेरे लंड ने पानी छोड़ दिया और मैं झड़ गया। मेरे लंड ने पहली बार अपना पानी छोड़ा था और मेरे पानी से रेशमा दी की पैंटी और नाइटगाऊन भीग गया था।

मुझे पता नहीं कि मेरे लंड ने कितना वीर्य निकाला था लेकिन जो कुछ निकला था वो मेरे रेशमा दी के नाम पर निकला था।

मेरा पहले पहले बार झड़ना इतना तेज था कि मेरे पैर जवाब दे गए, मैं पैरों पर ख़ड़ा नहीं हो पा रहा था और मैं चुपचाप बाथरूम के फ़र्श पर बैठ गया। थोड़ी देर के बाद मुझे होश आया तो मैं उठ कर नहाने लगा।

शॉवर के नीचे नहा कर मुझे कुछ ताजगी महसूस हुई और मैं फ़्रेश हो गया। नहाने के बाद मैं दीवार से रेशमा दी की नाइटगाऊन, ब्रा और पैंटी उतारा और उसमें से अपना वीर्य धोकर साफ़ किया और नीचे रख दिया।

उस दिन के बाद से मेरा यह मुठ मारने का तरीका मेरा सबसे पसंदीदा हो गया। हाँ, मुझे इस तरह से मुठ मारने का मौका सिर्फ इतवार को ही मिलता था, क्योंकि इतवार के दिन ही मैं रेशमा दी के नहाने के बाद नहाता था।

इतवार के दिन चुपचाप अपने बिस्तर पर पड़ा देखा करता था कि कब रेशमा दी बाथरूम में घुसे और रेशमा दी के बाथरूम में घुसते ही मैं उठ जाया करता था और जब रेशमा दी बाथरूम से निकलती तो मैं बाथरूम में घुस जाया करता था।

मेरे माँ और पिताजी सुबह सुबह उठ जाया करते थे और जब मैं उठता था तो माँ रसोई में नाश्ता बनाती होतीं और पिताजी बाहर बालकनी में बैठ कर अखबार पढ़ते होते या बाज़ार गए होते कुछ ना कुछ समान ख़रीदने।

इतवार को छोड़ कर मैं जब भी मुठ मारता तो तब यही सोचता कि मैं अपना लंड रेशमा दी की रस भरी चूत में पेल रहा हूँ। शुरू शुरू में मैं यह सोचता था कि रेशमा दी जब नंगी होंगी तो कैसी दिखेंगी? फिर मैं यह सोचने लगा कि रेशमा दी की चूत चोदने में कैसा लगेगा।

मैं कभी कभी सपने में रेशमा दी को नंगी करके चोदता था और जब मेरी आँखें खुलती तो मेरा शॉर्ट भीगा हुआ होता था।

मैंने कभी भी अपनी सोच और अपने सपने के बारे में किसी को भी नहीं बताया था और ही रेशमा दी को भी इसके बारे में जानने दिया।

मैं अपनी स्कूल की पढ़ाई खत्म करके कालेज जाने लगा। कॉलेज में मेरी कुछ गर्लफ्रेंड भी हो गई। उन गर्लफ्रेंड में से मैंने दो चार के साथ सेक्स का भी मजा लिया।

मैं जब कोई गर्लफ्रेंड के साथ रेशमा दी करता तो मैं उसको अपने रेशमा दी के साथ तुलना करता और मुझे कोई भी गर्लफ्रेंड रेशमा दी के बराबर नहीं लगती!

मैं बार बार यह कोशिश करता था कि मेरा दिमाग रेशमा दी पर से हट जाए, लेकिन मेरा दिमाग घूम फिर कर रेशमा दी पर ही जाता। मैं हमेशा 24 घंटे रेशमा दी के बारे में और उसको चोदने के बारे में ही सोचता रहता।

मैं जब भी घर पर होता तो रेशमा दी को ही देखता रहता, लेकिन इसकी जानकारी रेशमा दी को नहीं थीं। रेशमा दी जब भी अपने कपड़े बदलती थीं या माँ के साथ घर के काम में हाथ बटाती तो मैं चुपके चुपके उन्हें देखा करता था और कभी कभी मुझे उनकी सुडौल चूची देखने को मिल जाती (ब्लाउज़ के ऊपर से) थी।

रेशमा दी के साथ अपने छोटे से घर में रहने से मुझे कभी कभी बहुत फायदा हुआ करता था। कभी मेरा हाथ उनके शरीर से टकरा जाता था। मैं रेशमा दी के दो भरे भरे चूची और गोल गोल चूतड़ों को छूने के लिए मरा जा रहा था।

मेरा सबसे अच्छा टाइम पास था अपने बालकोनी में खड़े हो कर सड़क पर देखना, और जब रेशमा दी पास होती तो धीरे धीरे उनकी चूचियों को छूना।

हमारे घर की बालकोनी कुछ ऐसी थी कि उसकी लम्बाई घर के सामने गली के बराबर में थी और उसकी संकरी सी चौड़ाई के सहारे खड़े हो कर हम सड़क देख सकते थे।

मैं जब भी बालकोनी पर खड़े होकर सड़क को देखता तो अपने हाथों को अपने सीने पर मोड़ कर बालकोनी की रेलिंग के सहारे ख़ड़ा रहता था।

कभी कभी रेशमा दी आती तो मैं थोड़ा हट कर रेशमा दी के लिए जगह बना देता और रेशमा दी आकर अपने बगल ख़ड़ी हो जाती। मैं ऐसे घूम कर ख़ड़ा होता कि रेशमा दी को बिलकुल सट कर खड़ा होना पड़ता। रेशमा दी की भरी भरी चूची मेरे सीने से सट जाता था।

मेरे हाथों की उंगलियाँ, जो कि बालकोनी के रेलिंग के सहारे रहती वे रेशमा दी की चूचियों से छू जाती थी।

मैं अपने उंगलियों को धीरे धीरे रेशमा दी की चूचियों पर हल्के हल्के चलाता था और रेशमा दी को यह बात नहीं मालूम थी। मैं उँगलियों से रेशमा दी की चूची को छू कर देखा कि उनकी चूची कितनी नरम और मुलायम है लेकिन फिर भी तनी तनी रहा करती है कभी कभी मैं रेशमा दी के चूतड़ों को भी धीरे धीरे अपने हाथों से छूता था।

मैं हमेशा ही रेशमा दी की सेक्सी शरीर को इसी तरह से छूता था।

मैं समझता था कि रेशमा दी मेरे हरकतों और मेरे इरादों से अनजान हैं रेशमा दी को इस बात का पता भी नहीं था कि उनका छोटा भाई उनके नंगे शरीर को चाहता है और उनकी नंगी शरीर से खेलना चाहता है लेकिन मैं ग़लत था।
फिर एक दिन रेशमा दी ने मुझे पकड़ लिया। उस दिन रेशमा दी किचन में जा कर अपने कपड़े बदल रही थीं। हॉल और किचन के बीच का पर्दा थोड़ा खुला हुआ था। रेशमा दी दूसरी तरफ़ देख रही थीं और अपनी कुर्ती उतार रही थीं और उनकी ब्रा में छूपी हुई चूची मेरे नज़रों के सामने था।

फ़िर रोज़ की तरह मैं टी वी देख रहा था और रेशमा दी को भी कनखियों से देख रहा था।

रेशमा दी ने तब एकाएक सामने वाले दीवार पर टंगे शीशे को देखा और मुझे आँखें फ़िरा फ़िरा कर घूरते हुए पाया। रेशमा दी ने देखा कि मैं उनकी चूचियों को घूर रहा हूँ। फिर एकाएक मेरे और रेशमा दी की आँखे शीशे में टकरा गई मैं शर्मा गया और अपनी आँखें टी वी की तरफ़ कर ली।

मेरा दिल क्या धड़क रहा था। मैं समझ गया कि रेशमा दी जान गई हैं कि मैं उनकी चूचियों को घूर रहा था। अब रेशमा दी क्या करेंगी?
क्या रेशमा दी माँ और पिताजी को बता देंगी? क्या रेशमा दी मुझसे नाराज़ होंगी?
इसी तरह से हज़ारों प्रश्न मेरे दिमाग़ में घूम रहे थे। मैं रेशमा दी की तरफ़ फिर से देखने का साहस जुटा नहीं पाया।

उस दिन सारा दिन और उसके बाद 2-3 दिनों तक मैं रेशमा दी से दूर रहा, उनके तरफ़ नहीं देखा। इन 2-3 दिनों में कुछ नहीं हुआ। मैं ख़ुश हो गया और रेशमा दी को फिर से घूरना चालू कर दिया।

रेशमा दी ने मुझे 2-3 बार फिर घूरते हुए पकड़ लिया, लेकिन फिर भी कुछ नहीं बोलीं। मैं समझ गया कि रेशमा दी को मालूम हो चुका है कि मैं क्या चाहता हूँ!

ख़ैर जब तक रेशमा दी को कोई एतराज़ नहीं तो मुझे क्या लेना देना और मैं मज़े से रेशमा दी को घूरने लगा।
एक दिन मैं और रेशमा दी अपने घर के बालकोनी में पहले जैसे खड़े थे। रेशमा दी मेरे हाथों से सट कर ख़ड़ी थीं और मैं अपने उँगलियों को रेशमा दी के चूची पर हल्के हल्के चला रहा था।

मुझे लगा कि रेशमा दी को शायद यह बात नहीं मालूम कि मैं उनकी चूचियों पर अपनी उँगलियों को चला रहा हूँ। मुझे इस लिए लगा क्योंकि रेशमा दी मुझसे फिर भी सट कर ख़ड़ी थीं।

लेकिन मैं यह तो समझ रहा था क्योंकि रेशमा दी ने पहले भी नहीं टोका था, तो अब भी कुछ नहीं बोलेंगी और मैं आराम से रेशमा दी की चूचियों को छू सकता हूँ।

हम लोग अपने बालकोनी में खड़े थे और आपस में बातें कर रहे थे, हम लोग कॉलेज और स्पोर्ट्स के बारे में बातें कर रहे थे। हमारे बालकोनी से सामने एक गली थी तो हम लोगों की बालकोनी में कुछ अंधेरा था।

बातें करते करते रेशमा दी मेरे उँगलियों को, जो उनकी चूची पर घूम रहा था, अपने हाथों से पकड़ कर अपनी चूची से हटा दिया। रेशमा दी को अपनी चूची पर मेरे उंगली का एहसास हो गया था और वो थोड़ी देर के लिए बातें करना बंद कर दीं और उनकी शरीर कुछ अकड़ गईं लेकिन, रेशमा दी अपने जगह से हिलीं नहीं और मेरे हाथों से सट कर खड़ी रहीं।

रेशमा दी ने मुझसे कुछ नहीं बोलीं तो मेरी हिम्मत बढ़ गई और मैंने अपना पूरा का पूरा पंजा रेशमा दी की एक मुलायम और गोल गोल चूची पर रख दिया।

मैं बहुत डर रहा था। पता नहीं रेशमा दी क्या बोलेंगी? मेरा पूरा का पूरा शरीर काँप रहा था। लेकिन रेशमा दी कुछ नहीं बोलीं। रेशमा दी सिर्फ़ एक बार मुझे देखीं और फिर सड़क पर देखने लगीं। मैं भी रेशमा दी की तरफ़ डर के मारे नहीं देख रहा था।

मैं भी सड़क पर देख रहा था और अपने